गीता जयंती : मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि - ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग का शाश्वत संदेश
✒️ लेखक : R. F. Tembhre Views: 649 प्रकाशन: 24 Dec 2025    अद्यतन: अद्यतन नहीं किया गया

गीता जयंती : मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि - ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग का शाश्वत संदेश

गीता जयंती: ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग का शाश्वत संदेश

परिचय: गीता जयंती भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष मास की शुक्ल एकादशी को मनाया जाता है। वर्ष 2025 में, यह 1 दिसंबर (सोमवार) को मनाई गई है। यह वह पावन तिथि है जब आज से लगभग 5,160 वर्ष पूर्व, कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में भगवान श्री कृष्ण ने अपने प्रिय सखा और शिष्य अर्जुन को 'श्रीमद्भगवद्गीता' का उपदेश दिया था। यह पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मानव जाति को धर्म, कर्तव्य, ज्ञान और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले एक अलौकिक ग्रंथ के अवतरण का महोत्सव है। यह दिन गीता के संदेश को स्मरण करने और जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लेने का अवसर प्रदान करता है।



पर्व का महत्व और पृष्ठभूमि

दिव्य उपदेश की तिथि: मान्यताओं के अनुसार, जिस दिन भगवान कृष्ण ने यह उपदेश दिया था, उस समय तिथि एकादशी, वार बुधवार था और नक्षत्र रोहिणी था। महाभारत युद्ध के आरम्भ होने से ठीक पहले, जब अर्जुन ने अपने सामने खड़े गुरुजनों, प्रियजनों और बंधु-बांधवों को देखकर मोहग्रस्त होकर शस्त्र उठाने से इनकार कर दिया, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके क्षत्रिय धर्म, आत्मा की अमरता और कर्मयोग के गूढ़ रहस्य समझाए। यह उपदेश लगभग 45 मिनट चला था।

ग्रंथ का स्वरूप: श्रीमद्भगवद्गीता को उपनिषदों का सार और योगशास्त्र माना जाता है। यह महाभारत के भीष्म पर्व के अध्याय 25 से 42 तक 18 अध्यायों में संकलित है, जिसमें कुल 700 श्लोक हैं। इसका विषय केवल युद्ध का समाधान नहीं, बल्कि जीवन की सभी समस्याओं का हल है। इसे 'गीतोपनिषद' भी कहा जाता है।

सार्वभौमिक स्वीकार्यता: यह ग्रंथ किसी विशेष धर्म या संप्रदाय तक सीमित न होकर, सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है। महात्मा गांधी ने इसे अपना 'आध्यात्मिक शब्दकोश' कहा, तो वहीं महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और रॉबर्ट ओपेनहाइमर जैसे लोगों ने भी इसके ज्ञान की गहराई को स्वीकार किया।



गीता के अनछुए पहलू और दार्शनिक बिंदु

कर्मयोग का दर्शन: गीता का केंद्रीय संदेश 'निष्काम कर्म' है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन)। यह सिखाता है कि फल की चिंता किए बिना, अपने निर्धारित कर्तव्यों को समर्पण भाव से पूरा करना ही सच्चा योग है।

त्रिगुणात्मक प्रकृति: गीता प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रजस और तमस—का विस्तृत वर्णन करती है। मानव का स्वभाव और उसके कर्म इन्हीं तीनों गुणों से प्रभावित होते हैं। मोक्ष की प्राप्ति के लिए इन गुणों के बंधन से ऊपर उठना आवश्यक बताया गया है।

स्थितप्रज्ञ की अवधारणा: यह गीता का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक पक्ष है। 'स्थितप्रज्ञ' वह व्यक्ति है जो सुख-दुख, मान-अपमान और लाभ-हानि में समभाव रखता है। जो अपनी इंद्रियों को वश में कर चुका है और जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है, वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
(दूसरे अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन है)।

विश्वरूप दर्शन: उपदेश के दौरान, भगवान कृष्ण अर्जुन को अपना विराट और अलौकिक 'विश्वरूप' दिखाते हैं, जिसमें अर्जुन को समस्त ब्रह्मांड, भूत, वर्तमान और भविष्य समाहित दिखाई देता है। यह दृश्य कृष्ण के ईश्वरीय स्वरूप को सिद्ध करता है और भक्ति योग का चरमोत्कर्ष है।

अहंकार का त्याग: गीता सिखाती है कि अहंकार (मैं कर्ता हूँ) ही सभी दुखों का मूल है। सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, और स्वयं को कर्ता मानना अज्ञान है। ईश्वर में विश्वास रखते हुए कर्म करना ही बंधन से मुक्ति दिलाता है।



वर्तमान जीवन में गीता की प्रासंगिकता

तनाव प्रबंधन: आधुनिक जीवन के तनाव और अनिश्चितता के बीच, गीता का संदेश—'जो हुआ, अच्छा हुआ; जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है; जो होगा, वह भी अच्छा होगा'—मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है। यह हमें वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करने और अतीत व भविष्य की चिंता से मुक्त रहने की प्रेरणा देता है।

नेतृत्व और निर्णय क्षमता: एक लीडर को स्थितप्रज्ञ होना चाहिए। गीता युद्ध के मैदान में भी सही निर्णय लेने, अपने धर्म पर अडिग रहने और भावनात्मक मोह से ऊपर उठकर कर्तव्य पालन करने की शिक्षा देती है, जो आज के कॉरपोरेट और सामाजिक जीवन के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है।

निष्कर्ष: गीता जयंती केवल एक प्राचीन घटना का स्मरणोत्सव नहीं है, बल्कि यह उस सनातन ज्ञान की उपासना का दिन है जो जीवन के हर मोड़ पर हमारा मार्गदर्शन करता है। यह हमें सिखाता है कि हमारा वास्तविक युद्ध बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि हमारे अपने मन के मोह, भय और अज्ञान से है। गीता का अध्ययन और अनुसरण हमें एक सार्थक, संतुलित और सफल जीवन की ओर ले जाता है।

आशा है, उपरोक्त जानकारी ज्ञानवर्धक लगी होगी।
लेखक
Samajh.MyHindi

हमारी मीडिया गैलरी

Categories



तीज-त्योहार एवं व्रत

इस श्रेणी में तीज त्यौहार एवं व्रत से संबंधित महत्वपूर्ण लेख उपलब्ध हैं।

Explore Blogs

सफल जीवन

इस श्रेणी के लेखों में उन विषयों को शामिल किया गया है जिसमें मनुष्य अपने जीवन काल में बेहतर कार्यक्षेत्र एवं कर्म क्षेत्र को चुनकर सफलता प्राप्त कर सकता है।

Explore Blogs

धर्म-अध्यात्म तार्किक पक्ष

इस श्रेणी के लेखों में धार्मिक, अध्यात्मिक विषयों के अंतर्गत जानकारी उपलब्ध है, जिसमें तार्किक पक्ष को रखते हुए उनकी मानव जीवन में महत्ता और उपयोगिता को बताने का प्रयास किया गया है।

Explore Blogs

ब्रम्हांड एवं जीवात्मा

इस श्रेणी के लेखों में ब्रह्मांड से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों पर प्रकार डाला गया है।

Explore Blogs

हमारी अन्य वेबसाइट्स

www.infosrf.com
www.edufavour.com
www.edudurga.com
www.rfhindi.com

हमारी वेब डिक्सनरीज

Pawari Dictionary
Sanskrit Dictionary

हमारे मोबाइल एप्स

Pawari Dictionary

Pawari Dictionary

Sanskrit Dictionary

Vidyarthi Sanskrit Dictionary